Monday, July 20, 2009

चरित्र हत्या का यह खेल हिंदी में पुराना है...

हिंदी में चरित्र हत्या का खेल पुराना है केवल मोहरे बदल जाते हैं और कई बार तो यूं भी होता है कि बार-बार किसी एक ही चरित्र को बार-बार सजा दी जाती है उसके गुनाह ढूंढे जाते हैं और अभिमन्यू की तरह उसे घेर लिया जाता है चारों ओर से, उसके बचने की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी जाती, और विचारधारा के नाम पर उस पर अपनी सारी कुंठा उतार ली जाती है। उदयप्रकाश के संदर्भ में भी कुछ ऐसा ही हुआ है ऐसा बार-बार हुआ है यह उनकी ही पीड़ा नहीं है निराला से लेकर अज्ञेय और फिर निर्मल वर्मा तक हर लेखक को हिंदी की इस घटिया राजनीति का सामना करना पड़ा है। और हम हिंदी पट्टी को ही दोषी क्यों ठहरायें, विचारधारा के नाम पर हमेशा से हम अपने बड़े कवियों पर आरोप लगाते रहे हैं। वर्ड्सवर्थ का प्रसंग आपको याद होगा जब बायरन ने क्रांति का विरोधी होने पर उन्हें सोने के चंद सिक्कों की खातिर साथ छोड़ देने का आरोप लगाया था तब जबकि क्रांति बुरी तरह से अपने रास्ते से भटक गई थी। बिना सुनवाई के सजा देने का मामला साहित्य की पुरानी परंपरा रही है। हम कसाब जैसे हत्यारे को भी इस तरह से सजा नहीं देते तो अपने महान लेखकों को कटघरे में खड़े करने का हमें क्या अधिकार है। उदयप्रकाश से उनके कुछ प्रशंसक जो उनके लिखे को कल्ट की तरह मानने का दावा करते हैं अब यह पूछ रहे हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। क्या वह उनसे ऐसा पूछ सकते हैं। अगर हां, तो उदय झूठे नहीं हैं वह भाषा झूठी है जो केवल आध्यात्मिक क्षणों में अपने को अभिव्यक्त करती है और शेष क्षणों में लेखक अपने पुराने ढर्रे में लौट आता है। उदय पर आरोप लगाने से पहले हमें यह जरूर विचार करना चाहिए कि इन अध्यात्मिक क्षणों को जिये बगैर और उन्हें आत्मसात किये बगैर कोई लेखक अपनी भाषा में ऐसा देवत्व हासिल कर सकता है।

1 comment:

गिरिजेश राव said...

उदात्त(वामपंथी भाइयों से क्षमा सहित)
मानव को थूकने के लिए एक सूरज चाहिए। अपने उपर गिरे या न गिरे,कोई फरक नहीं।
थूकने के लिए एक अदद थूकदान चाहिए।