Saturday, December 5, 2009

क्या हनुमान के लंका दहन को हिंसा के दायरे में रखा जा सकता है?

सुबह-सुबह मां सुंदरकांड का पाठ पढ़ती है, आज ध्यान चला गया, पहले तो विभीषण के प्रसंग पर कि पूरी लंका में एक सुंदर जगह दिखी जहां तुलसी का पौधा लगा हुआ था और एक व्यक्ति जो शैतानों की बस्ती में भी अपना इमान खोये बगैर अपने उच्चतर उद्देश्यों को लेकर लगा हुआ है। फिर प्रसंग कि हनुमान भूखे थे और मां सीता से अशोक वाटिका में फल खा लेने की आज्ञा मांगी बहुत सुंदर प्रसंग था। फिर इसके बाद हनुमान की पूंछ में आग और फिर ईंट का जवाब पत्थर से, पूरी लंका को धूं-धूं कर दिया। इस घटना को बार-बार सुना लेकिन पहली बार प्रश्न मन में आया कि क्या हनुमान का लंका दहन हिंसा थी या एक ऐसे शासक को दी गई चुनौती थी जिसके राज्य में माताओं और बहनों की अस्मत भी सुरक्षित नहीं रह गई थी। यहां हम राम का चरित्र देखें तो उन्होंने हर स्तर पर युद्ध को टालने की कोशिश की, अंगद को भेजा और अंगद का जब अपमान किया गया तो वह पैर जमाकर बैठ गये।
यद्यपि हनुमान ने लंका जलाई लेकिन किसी भी रहवासी को तकलीफ पहुंचाई हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता, केवल उन्होंने समृद्धि के मद में चूर हो गये एक शहर को चुनौती दी कि इस समृद्धि को हासिल करने के लिए उन्होंने कितने निर्दोषों को सताया है। विचार करने पर मुझे यह प्रसंग फिर बेहद सहज लगा।

2 comments:

अफ़लातून said...

विभीषण की मौजूदगी , यह बिना छिपाये कि वह राम भक्त है !क्या यह रावण-राज में अभिव्यक्ति की आज़ादी का द्योतक नहीं है ?

सतीश पंचम said...

अफलातून जी की बात में दम है। रामायण का यह प्रसंग तो बचपन से मन मानस पर अंकित है।