Wednesday, August 13, 2008

मीना फंड

अलीबाबा का खजाना भारतीय निवेशकों के लिए…...........
भारत का हर निवेशक और तरक्की पसंद व्यवसायी धीरुभाई अंबानी से प्रेरणा ग्रहण करना पसंद करता है अगर आप भी उनके मुरीदों में से हैं और उनकी परीकथा जैसी जीवनी से प्रेरणा लेना चाहते हैं तो आपको उनके मिडिल ईस्ट में गुजारे हुए दिनों को खंगालना होगा जहाँ से उन्होंने व्यावसायिक कूटनीति के गुर सीखे और पहली बार आजमाये भी। जब धीरुभाई अदन में थे और मामूली सी नौकरी कर रहे थे तब यूनान की सरकार के समक्ष एक बड़ा मौद्रिक संकट आया, वह यूँ कि यूनान के आधिकारिक सिक्के धीरे-धीरे मार्केट से गायब होने लगे। जब इस बाबत जाँच एजेंसियों को लगाया गया तब मालूम हुआ कि सिक्के अदन में रहने वाला भारतीय मूल का एक नागरिक धीरुभाई अंबानी मँगवा रहा है। प्रथमदृष्टया तो जाँच अधिकारियों को इसका कारण समझ नहीं आया लेकिन विस्तृत तफ्तीश करने पर पाया गया कि धीरुभाई सिक्कों को गलाकर धातु अदन के सराफा व्यवसायियों के पास बेच रहे थे जिससे उन्होंने भारी मुनाफा कमाया। यहाँ पर जितना कमाल धीरुभाई का है उतना ही कमाल मिडिल ईस्ट की मिट्टी का, जहाँ हर महत्वाकाँक्षी निवेशक के लिए असीम संभावनायें हैं। विदेशी फंडों को अनुमति देने में कई तरह की पेंच की वजह से हाल तक यह क्षेत्र एफआईआई के मध्य लोकप्रिय नहीं था, इन बाधाओं को पार करते हुए फ्रेंकलिन टेंपलटन ने दुनिया के विभिन्न देशों में हाल ही में मीना फंड लाँच किये जो मिडिल ईस्ट और नार्थ अफ्रीका की अर्थव्यवस्था में पूँजी लगाते हैं। भारतीय निवेशकों को मिडिल ईस्ट और नार्थ अफ्रीका के बाजार का लाभ दिलाने फ्रेंकलिन टेंपलटन ने मीना फंड का प्रस्ताव सेबी के समक्ष रखा है।
मिडिल ईस्ट पर दाँव क्यों ?
भारत एवं अन्य देशों के शेयर बाजार भले ही कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के चलते हाँफ रहे हों लेकिन इनकी कीमतों में आई तेज बढ़ोत्तरी से जिन देशों को प्रत्यक्ष लाभ हो रहा है वह ओपेक देश हैं विशेषकर कुवैत और सऊदी अरब जैसे देश, जहाँ के राजनैतिक तंत्र अमेरिकन व्यवस्था के करीब हैं और जिनमें राजनैतिक स्थायित्व भी अन्य मिडिल ईस्ट देशों से अधिक है। विदेशी फंडों की निगाहें इस ओर मुड़ने का स्पष्ट कारण तेल की बढ़ती कीमतें हैं। पिछले साल के 70 डालर प्रति बैरल से बढ़कर 130 डालर प्रति बैरल तक पहुँच जाने की वजह से तेल उत्पादक इन देशों की सरकारों का राजस्व तेजी से बढ़ा है। यह पूँजी सीधे आधारभूत संरचनाओं में लगाई जा रही है। आईएमएफ ने इस वर्ष की अपनी रिपोर्ट में इस क्षेत्र की विकास दर 6.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है और इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के संबंध में सकारात्मक टिप्पणी की है। फ्रेंकलिन टेंपलटन के मिडिल ईस्ट क्षेत्र का वित्तीय प्रबंधन करने वाले स्टीफन डावर मध्य एशिया में दाँव लगाने के निम्न कारण गिनाते हैं।
(1) डिकपल इकानामीः मीना देशों के बाजार का वैश्विक बाजारों से न्यूनतम संबंध(.112) है जबकि उभरते हुए देशों(इमर्जिंग इकानामी) का इनसे संबंध अधिक गहरा(.66) है।(सहसंयोजी गुणाँक) स्वाभाविक रूप से वैश्विक बाजारों की मंदी का इस फंड पर न्यूनतम असर होगा।
(2) आकर्षक मूल्याँकन पर घरेलू कंपनियाँ –रेटिंग एजेंसी एस एन्ड पी की गणना के मुताबिक मिडिल ईस्ट और नार्थ अफ्रीका की कंपनियों के शेयर इमर्जिंग मार्केट की तुलना में अपेक्षाकृत कम मूल्याँकन पर उपलब्ध हैं।
(3) मुद्रा के अल्पमूल्याँकन का लाभः विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल मीना क्षेत्र की मुद्रा 10 से 15 फीसदी अल्पमूल्याँकित हैं भविष्य में इस स्थिति में सुधार होगा जिसका लाभ घरेलू कंपनियों को मिलेगा।
किस सेक्टर में लगायेंगे दाँवः
फ्रेंकलिन टेंपलटन की नजर तीन क्षेत्रों पर है। पहला तो रीयल एस्टेट से संबंधित हैं, अनुकूल ब्याज दरों के चलते रीयलिटी सेक्टर में और अधिक उफान आने की संभावना फंड मैनेजर लगा रहे हैं। दूसरा क्षेत्र लाजिस्टक और वेयरहाऊसिंग से जुड़ा हुआ है, यह ऐसे क्षेत्र हैं जो मुद्रास्फीति के चलते बढ़ी लागत को पूरी तौर पर उपभोक्ता को हस्तांतरित करने में सक्षम हैं। तीसरा क्षेत्र फर्टिलाइजर से जुड़ा है, दुनिया भर में कमोडिटी के संकट के चलते कृषि सुधारों पर ध्यान दिया जा रहा है और ऐसे में फर्टिलाइजर(प्राकृतिक गैस से उत्पादित) की माँग तेजी से बढ़ रही है।
क्या है जोखिमः
मीना देशों के बाजार पर विदेशी फंडों की निगाह का कारण तेजी से बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें हैं। यद्यपि माँग और आपूर्ति का सिद्धाँत तेल कीमतों के बढ़ने के पक्ष में वकालत करता है लेकिन एक साल में ही कीमतें दूगनी पहुँच जाना किसी न किसी तरह के स्पैक्युलेशन(सट्टागत प्रवृत्ति) की ओर जरूर इशारा करता है। मीना देशों के विपरीत अधिकाँश इमर्जिंग देशों में विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक की गति से बढ़ रही है। सबसे बड़ा जोखिम इन क्षेत्रों की अस्थिर राजनैतिक स्थिति का है। जेरुसलम पोस्ट में इजराइल की मिलेट्री तैयारी(ईरान और अमेरिका में बढ़ते गतिरोध के चलते) से संबंधित जिस तरह की खबरें छपी हैं भले ही इजराइल ने इसका खंडन कर दिया है लेकिन इससे यहाँ के तनावपूर्ण माहौल का अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी आशंका मिडिल ईस्ट और नार्थ अफ्रीका के बाजारों की परिपक्वता को लेकर हो सकती है। बरसों तक यहाँ के बाजार विदेशी बाजारों से असंबद्ध (डिकपल्ड) रहे जिससे वित्तीय गड़बड़ियों से निपटने के यहाँ की नियामक संस्थाओं की सक्षमता पर प्रश्न चिह्न खड़े किये जा सकते हैं।(गौरतलब है कि भारत तथा अमेरिका जैसे देशों ने वित्तीय गड़बड़ियों के लंबे अनुभवों से हर बार सीख लेकर नियामक तंत्र को अधिक सक्रिय बनाने का प्रयास किया है।)

No comments: